जब भी छत से बैठकर, देखता हुँ ढलती हुई शाम,
अरब सागर मे डूब रहा होता है, सूरज लेकर अल्पविराम,
निकल पड़ते हैं परिंदे, होते ही शाम,
अँधेरे से पहले पहुँच, ठिकाने करे आराम ।
अपनी चहचहाहट से सुबह , देते सबको पैगाम,
उठ कर साथियों करो, सूरज की सुनहरी किरणों को सलाम,
फिर भी सोता, रहता है इंसान,
सब जानकर भी, होता है अंजान,
जब हार जाता है, करके कोशीश तमाम,
फिर रोता है, होकर जीवन से परेशान,
अंत में जब होजाता, है जीवन दुखी और वीरान,
तब याद आता है अल्लाह, वाहेगुरु, ईशा और भगवान।
जीवन से समय निकाल, कर भक्ति योग और ध्यान,
यही समय है करले, अपने मूल तत्व की पहचान,
जीवन खिल उठेगा, चेहरे मे आएगी मुस्कान,
अंतरात्मा को मिलेगा, एक नया जीवनदान ।।




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